आपातकालीन नागरिक हेल्पलाइन

अनुच्छेद 368 Part XX

संविधान का संशोधन करने की संसद की शक्ति और उसके लिए प्रक्रिया

त्वरित सारांश (TL;DR)
संसद को विशेष बहुमत से संविधान में संशोधन करने की शक्ति देता है, लेकिन सुप्रीम कोर्ट के "मूल संरचना सिद्धांत" द्वारा संसद पर अंकुश लगाता है।
अनुच्छेद 368 संविधान संशोधन की प्रक्रिया तय करता है। इसके तहत संविधान को समय के साथ बदलने की शक्ति संसद के पास है (दो-तिहाई विशेष बहुमत से)। लेकिन 1973 के ऐतिहासिक 'केशवानंद भारती' फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने तय किया कि संसद संविधान के 'मूल ढांचे' (Basic Structure)—जैसे लोकतंत्र, पंथनिरपेक्षता, न्यायपालिका की स्वतंत्रता, मौलिक अधिकार व कानून का राज—को कभी नष्ट नहीं कर सकती।
लोकतंत्र और मौलिक अधिकारों को किसी भी सरकार द्वारा खत्म किए जाने से सुरक्षा
संवैधानिक संशोधनों को सुप्रीम कोर्ट में चुनौती देने का अधिकार
संघीय ढांचे में बदलाव के लिए आधे राज्यों की सहमति की अनिवार्य शर्त
संशोधन कभी भी संविधान के मूल ढांचे को नहीं बदल सकता। ऐसा कोई भी संशोधन असंवैधानिक घोषित कर रद्द कर दिया जाता है।
यह सुनिश्चित करता है कि संसद में चाहे किसी भी पार्टी का भारी बहुमत हो, वह भारत को तानाशाही नहीं बना सकती और न ही नागरिकों के अधिकार छीन सकती है।
और गहराई से पढ़ना चाहते हैं? आधिकारिक राजपत्रित मूल पाठ या सुप्रीम कोर्ट निर्णय व संविधान सभा बहस देखें:
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