संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए न्यायालयों, प्राधिकारियों और अधिकारियों का कृत्य करते रहना
त्वरित सारांश (TL;DR)
अनुच्छेद 375 (संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए न्यायालयों, प्राधिकारियों और अधिकारियों का कृत्य करते रहना): भाग XXI के तहत विभिन्न राज्यों के क्षेत्रीय विकास, जनजातीय संरक्षण और संक्रमणकालीन संवैधानिक उपबंध।
सरल नागरिक भाषा में अर्थ
संविधान के भाग XXI का अनुच्छेद 375 'संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए न्यायालयों, प्राधिकारियों और अधिकारियों का कृत्य करते रहना' का उपबंध करता है। यह विभिन्न राज्यों (अनुच्छेद 371 श्रृंखला: महाराष्ट्र, गुजरात, नगालैंड, असम, मणिपुर, आंध्र प्रदेश, सिक्किम, मिजोरम, अरुणाचल प्रदेश, गोवा आदि) के लिए विशेष क्षेत्रीय विकास व सांस्कृतिक संरक्षण, अथवा 1950 में संविधान लागू होने के समय प्रचलित कानूनों और न्यायिक संस्थाओं की निरंतरता (अनुच्छेद 372-392) को निर्धारित करता है।
प्रमुख संवैधानिक उपबंध एवं बिंदु
संवैधानिक प्रावधान (अनुच्छेद 375): Part XXI के अंतर्गत 'संविधान के उपबंधों के अधीन रहते हुए न्यायालयों, प्राधिकारियों और अधिकारियों का कृत्य करते रहना' के लिए बाध्यकारी कानूनी नियम तय करता है
यह एक सीधा और स्पष्ट संवैधानिक निर्देश है जिसका पालन करना सभी संबंधित प्राधिकारियों के लिए अनिवार्य है
अनुच्छेद 375 के उल्लंघन में की गई किसी भी प्रशासनिक कार्रवाई को हाई कोर्ट (अनुच्छेद 226) या सुप्रीम कोर्ट में चुनौती दी जा सकती है
अपवाद एवं युक्तियुक्त निर्बंधन (सीमाएं)
अनुच्छेद 372(1) के अनुसार संविधान से पहले के कानून तभी तक लागू रहते हैं जब तक वे संविधान के मौलिक अधिकारों का उल्लंघन न करें।
दैनिक जीवन में यह क्यों महत्वपूर्ण है?
यह भारत की क्षेत्रीय विविधता का सम्मान करता है और विधिक व्यवस्था की निरंतरता सुनिश्चित करता है।
और गहराई से पढ़ना चाहते हैं? आधिकारिक राजपत्रित मूल पाठ या सुप्रीम कोर्ट निर्णय व संविधान सभा बहस देखें: