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🇮🇳 भारत का सर्वोच्च विधान • 26 जनवरी 1950 को लागू

भारत का संपूर्ण संविधान: डिजिटल नागरिक महाग्रंथ

विश्व के सबसे विस्तृत लिखित संविधान के 395 अनुच्छेदों, 25 भागों और 12 अनुसूचियों का अध्ययन करें सरल नागरिक भाषा, संविधान सभा के ऐतिहासिक विमर्श और सर्वोच्च अदालत के फैसलों के साथ।

395+
अनुच्छेद (Articles)
25
भाग (Thematic Parts)
12
अनुसूचियां (Schedules)
106
संशोधन (Amendments)
📜 उद्देशिका “हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए...”
“हम, भारत के लोग, भारत को एक सम्पूर्ण प्रभुत्व-सम्पन्न समाजवादी पंथनिरपेक्ष लोकतंत्रात्मक गणराज्य बनाने के लिए, तथा उसके समस्त नागरिकों को: सामाजिक, आर्थिक और राजनैतिक न्याय; विचार, अभिव्यक्ति, विश्वास, धर्म और उपासना की स्वतंत्रता; प्रतिष्ठा और अवसर की समता प्राप्त कराने के लिए, तथा उन सब में व्यक्ति की गरिमा और राष्ट्र की एकता और अखंडता सुनिश्चित करने वाली बंधुता बढ़ाने के लिए दृढ़संकल्प होकर अपनी इस संविधान सभा में आज तारीख 26 नवम्बर, 1949 ईस्वी को एतद्द्वारा इस संविधान को अंगीकृत, अधिनियमित और आत्मार्पित करते हैं।”
Page 1 • सरल नागरिक भाषा में
अनुच्छेद 36
Part IV

परिभाषा (नीति निर्देशक तत्वों के लिए "राज्य" की परिभाषा)

संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 36 'परिभाषा (नीति निर्देशक तत्वों के लिए "राज्य" की परिभाषा)' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।

अनुच्छेद 37
Part IV

इस भाग में अंतर्विष्ट तत्वों का लागू होना

संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 37 'इस भाग में अंतर्विष्ट तत्वों का लागू होना' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।

अनुच्छेद 38
Part IV

राज्य लोक कल्याण की अभिवृद्धि के लिए सामाजिक व्यवस्था बनाएगा

अनुच्छेद 38 संविधान के भाग IV (नीति निर्देशक तत्व) की आत्मा है। यह भारत को औपनिवेशिक 'पुलिस राज्य' से बदलकर एक 'लोक-कल्याणकारी राज्य' (Welfare State) बनाता है। अनुच्छेद 38(1) राज्य को आदेश देता है कि वह ऐसी सामाजिक व्यवस्था बनाए जिसमें सामाजिक, आर्थिक और राजनीतिक न्याय राष्ट्रीय जीवन की सभी संस्थाओं को अनुप्राणित करे। 44वें संशोधन (1978) द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 38(2) सरकार को अमीरी-गरीबी की खाई पाटने तथा अलग-अलग क्षेत्रों व व्यवसायों के लोगों के बीच आय, प्रतिष्ठा और सुविधाओं की असमानता खत्म करने का निर्देश देता है।

अनुच्छेद 39
Part IV

राज्य द्वारा अनुसरण किए जाने वाले कुछ नीति तत्व (समान कार्य के लिए समान वेतन आदि)

अनुच्छेद 39 में 6 क्रांतिकारी आर्थिक और सामाजिक सिद्धांत (खंड क से च) दिए गए हैं जो हमारे कामकाजी जीवन को सीधे प्रभावित करते हैं: • अनुच्छेद 39(a): पुरुष और स्त्री सभी नागरिकों को समान रूप से आजीविका के पर्याप्त साधन प्राप्त करने का अधिकार हो। • अनुच्छेद 39(b) व (c): देश के भौतिक संसाधनों का वितरण सामूहिक हित में हो और अर्थव्यवस्था में धन कुछ ही अमीरों के हाथों में केंद्रित न हो। • अनुच्छेद 39(d) — समान कार्य के लिए समान वेतन: पुरुषों और स्त्रियों दोनों को समान काम के लिए बराबर वेतन मिले (समान पारिश्रमिक अधिनियम, 1976)। • अनुच्छेद 39(e) व (f): श्रमिकों के स्वास्थ्य का शोषण न हो, आर्थिक मजबूरी में किसी को अपनी उम्र या ताकत से बाहर के काम में न धकेला जाए, और बच्चों को स्वतंत्र व गरिमामय वातावरण में स्वस्थ विकास के अवसर मिलें।

अनुच्छेद 39A
Part IV

समान न्याय और निःशुल्क विधिक सहायता (मुफ्त कानूनी सहायता)

अनुच्छेद 39A (42वें संविधान संशोधन, 1976 द्वारा जोड़ा गया) सुनिश्चित करता है कि न्याय केवल अमीरों की जागीर न बने। यह राज्य को आदेश देता है कि आर्थिक या अन्य अक्षमताओं के कारण किसी भी नागरिक को न्याय पाने के अवसर से वंचित न किया जाए। इसी अनुच्छेद के तहत संसद ने 'विधिक सेवा प्राधिकरण अधिनियम, 1987' बनाया, जिससे राष्ट्रीय विधिक सेवा प्राधिकरण (NALSA), प्रत्येक जिले में DLSA और लोक अदालतों की स्थापना हुई। सभी महिलाओं (आय चाहे जितनी भी हो), बच्चों, अनुसूचित जाति/जनजाति (SC/ST), दिव्यांगजनों, हिरासत में बंद विचाराधीन कैदियों और कम आय वाले नागरिकों को मुकदमा लड़ने के लिए 100% मुफ्त सरकारी वकील और कोर्ट फीस से छूट मिलती है।

अनुच्छेद 40
Part IV

ग्राम पंचायतों का संगठन

महात्मा गांधी के 'ग्राम स्वराज' के सपने को साकार करने के लिए अनुच्छेद 40 में ग्राम पंचायतों के गठन का निर्देश दिया गया था। 1992 में 73वें और 74वें संविधान संशोधन अधिनियम द्वारा इसे भाग IX (अनुच्छेद 243–243O) के रूप में संवैधानिक दर्जा दिया गया, जिससे ग्राम सभा, त्रि-स्तरीय पंचायती राज और महिलाओं के लिए कम से कम एक-तिहाई (कई राज्यों में 50%) आरक्षण अनिवार्य हुआ।

अनुच्छेद 41
Part IV

कुछ दशाओं में काम, शिक्षा और लोक सहायता पाने का अधिकार

अनुच्छेद 41 भारत के सामाजिक सुरक्षा तंत्र की जननी है। यह राज्य को निर्देश देता है कि वह अपनी आर्थिक क्षमता के भीतर काम पाने, शिक्षा पाने और बेरोजगारी, बुढ़ापे, बीमारी व दिव्यांगता की दशा में सरकारी सहायता दिलाने का प्रभावी प्रबंध करे। मनरेगा (MGNREGA 2005 — 100 दिन के रोजगार की गारंटी), दिव्यांगजन अधिकार अधिनियम (RPwD Act 2016), वृद्धावस्था पेंशन और विधवा पेंशन योजनाएं इसी अनुच्छेद की देन हैं।

अनुच्छेद 42
Part IV

काम की न्यायसंगत और मानवोचित दशाओं का तथा प्रसूति सहायता का उपबंध

अनुच्छेद 42 भारत की कामकाजी महिलाओं और माताओं का संवैधानिक सुरक्षा कवच है। यह राज्य को कार्यस्थल पर मानवीय परिस्थितियां बनाने और 'प्रसूति सहायता' (Maternity Relief) सुनिश्चित करने का आदेश देता है। इसी अनुच्छेद के तहत 'मातृत्व लाभ अधिनियम, 1961' (2017 के संशोधन द्वारा 26 सप्ताह का पूर्ण सवैतनिक मातृत्व अवकाश) बनाया गया। 'दिल्ली नगर निगम बनाम महिला श्रमिक (2000)' मामले में सुप्रीम कोर्ट ने ऐतिहासिक फैसला दिया कि केवल स्थायी ही नहीं, बल्कि दिहाड़ी (Daily-wage), अस्थायी और संविदा पर काम करने वाली महिलाओं को भी मातृत्व अवकाश का पूरा अधिकार है।

अनुच्छेद 43
Part IV

कर्मकारों के लिए निर्वाह मजदूरी और शिष्ट जीवन-स्तर

अनुच्छेद 43 भारतीय श्रमिकों के अधिकारों का घोषणापत्र है। यह राज्य को निर्देश देता है कि वह खेतीहर, कारखाना या असंगठित क्षेत्र के सभी मजदूरों को काम, 'निर्वाह मजदूरी' (Living Wage), सम्मानजनक जीवन स्तर और उचित अवकाश (छुट्टी) सुनिश्चित करे। 'निर्वाह मजदूरी' का अर्थ केवल पेट भरना नहीं है, बल्कि इसमें परिवार की शिक्षा, इलाज, आवास और भविष्य की सुरक्षा (जैसे न्यूनतम मजदूरी कानून, EPF, ESIC) भी शामिल है।

अनुच्छेद 43A
Part IV

उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना

संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 43A 'उद्योगों के प्रबंध में कर्मकारों का भाग लेना' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।

अनुच्छेद 44
Part IV

नागरिकों के लिए एक समान सिविल संहिता (Uniform Civil Code)

अनुच्छेद 44 राज्य नीति का एक निर्देशक सिद्धांत है। यह राज्य को सलाह देता है कि वह देश के सभी नागरिकों के लिए एक समान नागरिक संहिता (यूनिफॉर्म सिविल कोड) बनाने का प्रयास करे। जहां आपराधिक व वाणिज्यिक कानून सभी के लिए समान हैं, वहीं शादी, तलाक और संपत्ति उत्तराधिकार के नियम अलग-अलग धर्मों के लिए अलग रहे हैं। अनुच्छेद 44 लैंगिक न्याय और समानता की परिकल्पना करता है।

अनुच्छेद 45
Part IV

छह वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा का उपबंध

संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 45 'छह वर्ष से कम आयु के बालकों के लिए प्रारंभिक बाल्यावस्था देखरेख और शिक्षा का उपबंध' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।

अनुच्छेद 46
Part IV

अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि

संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 46 'अनुसूचित जातियों, अनुसूचित जनजातियों और अन्य दुर्बल वर्गों के शिक्षा और अर्थ संबंधी हितों की अभिवृद्धि' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।

अनुच्छेद 47
Part IV

पोषाहार स्तर और जीवन स्तर को ऊंचा करने तथा लोक स्वास्थ्य का सुधार करने का राज्य का कर्तव्य

अनुच्छेद 47 स्पष्ट शब्दों में घोषणा करता है कि जनता के पोषाहार स्तर (Nutrition) और जीवन स्तर को ऊंचा करना तथा लोक स्वास्थ्य (Public Health) का सुधार करना राज्य के 'प्राथमिक कर्तव्यों' में से एक है। साथ ही, यह औषधीय प्रयोजनों से भिन्न स्वास्थ्य के लिए हानिकारक मादक पेयों और नशीले पदार्थों (Drugs) के सेवन पर प्रतिबंध लगाने का निर्देश देता है। मिड-डे मील, आंगनवाड़ी पोषण अभियान, सरकारी अस्पतालों में मुफ्त इलाज और खाद्य सुरक्षा कानून (FSSAI) इसी अनुच्छेद की देन हैं।

अनुच्छेद 48
Part IV

कृषि और पशुपालन का संगठन

संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 48 'कृषि और पशुपालन का संगठन' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।

अनुच्छेद 48A
Part IV

पर्यावरण का संरक्षण तथा संवर्धन और वन तथा वन्य जीवों की रक्षा

42वें संविधान संशोधन (1976) द्वारा जोड़ा गया अनुच्छेद 48A, अनुच्छेद 51A(g) (नागरिक कर्तव्य) और अनुच्छेद 21 (जीवन का अधिकार) के साथ मिलकर भारत का 'हरित संविधान' बनाता है। सुप्रीम कोर्ट ने इन तीनों अनुच्छेदों को मिलाकर 'प्रदूषण फैलाने वाला हर्जाना भरेगा' (Polluter Pays Principle) का नियम बनाया और 2024 में 'जलवायु परिवर्तन (Climate Change) के दुष्प्रभावों से मुक्त रहने के अधिकार' को मौलिक अधिकार घोषित किया।

अनुच्छेद 49
Part IV

राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण

संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 49 'राष्ट्रीय महत्व के संस्मारकों, स्थानों और वस्तुओं का संरक्षण' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।

अनुच्छेद 50
Part IV

कार्यपालिका से न्यायपालिका का पृथक्करण

अंग्रेजों के शासनकाल में जिले का कलेक्टर/डीएम ही पुलिस व लगान वसूली का मुखिया भी होता था और फौजदारी मुकदमों का जज भी—अर्थात पकड़ने वाला और फैसला सुनाने वाला एक ही व्यक्ति था! अनुच्छेद 50 ने इस अन्याय को समाप्त करने के लिए कार्यपालिका (पुलिस/प्रशासन) से न्यायपालिका (जजों) को अलग करने का आदेश दिया। इसी अनुच्छेद के तहत दंड प्रक्रिया संहिता, 1973 (और अब BNSS, 2023) में जमानत, रिमांड और मुकदमे की सुनवाई की सारी शक्तियां प्रशासन से छीनकर स्वतंत्र 'न्यायिक मजिस्ट्रेटों' (Judicial Magistrates) को दी गईं, जो सरकार के नहीं बल्कि सीधे हाईकोर्ट के अधीन काम करते हैं।

अनुच्छेद 51
Part IV

अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि

संविधान के भाग IV (राज्य के नीति निदेशक तत्व) का अनुच्छेद 51 'अंतरराष्ट्रीय शांति और सुरक्षा की अभिवृद्धि' का निर्देश देता है। अनुच्छेद 37 के अनुसार ये सिद्धांत देश के शासन में मूलभूत हैं और केंद्र तथा राज्य सरकारों का यह संवैधानिक कर्तव्य है कि वे कानून और जन-कल्याण की योजनाएं बनाते समय इन सिद्धांतों को लागू करें।

Part IV (19 अनुच्छेदs)
सार्वजनिक डोमेन (Public Domain) एवं वैधानिक प्रामाणिकता सूचना

भारतीय प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम (Copyright Act), 1957 की धारा 52(1)(q) के अंतर्गत भारत का संविधान, संसदीय अधिनियम, राजपत्र अधिसूचनाएं तथा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के निर्णय सार्वजनिक डोमेन (Public Domain) में हैं। यह पाठ विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय, भारत सरकार (India Code) के आधिकारिक अभिलेखों पर आधारित है।

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