क्या सड़क दुर्घटना में घायल की मदद करने पर पुलिस आपको परेशान कर सकती है?
बिल्कुल नहीं! गुड सेमेरिटन कानून के तहत घायल को अस्पताल पहुंचाने वाले को पुलिस पूछताछ और अस्पताल खर्च से पूरी छूट प्राप्त है।
- • अस्पताल मदद करने वाले व्यक्ति से पैसे या फॉर्म भरने की मांग नहीं कर सकता।
- घायल को तुरंत अस्पताल पहुंचाएं और डॉक्टरों को गुड सेमेरिटन कानून का हवाला दें।
क्या प्रदूषण प्रमाण पत्र (PUC) एक्सपायर होने पर पुलिस तुरंत गाड़ी जब्त कर सकती है?
नहीं। पीयूसी न होने पर चालान कट सकता है, लेकिन केवल इस कारण से गाड़ी जब्त करने का कोई अधिकार नहीं है।
- • जुर्माना लग सकता है, लेकिन पुलिस गाड़ी सीज नहीं कर सकती।
- कहें: 'सर, मैं तुरंत नजदीकी सेंटर जाकर नया पीयूसी बनवा रहा हूँ।'
क्या टोल प्लाजा पर 100 मीटर की पीली लाइन से लंबी लाइन होने पर टोल फ्री होता है?
एनएचएआई का नियम: यदि टोल पर 100 मीटर (पीली लाइन) से लंबी कतार हो या 3 मिनट से ज्यादा समय लगे, तो वाहन बिना टोल दिए जा सकता है।
- • प्रत्येक टोल लेन पर 100 मीटर की पीली लाइन का निशान होना अनिवार्य है।
- टोल कर्मी को 100 मीटर के नियम की याद दिलाएं।
क्या पुलिस बिना लिखित नोटिस के आपको थाने बुला सकती है?
नहीं। 7 साल से कम सजा वाले मामलों में पुलिस को धारा 41A (BNSS 35) के तहत औपचारिक लिखित नोटिस देना अनिवार्य है।
- • सुप्रीम कोर्ट के अर्नेश कुमार फैसले के अनुसार फोन पर थाने बुलाना गैरकानूनी है।
- • लिखित नोटिस का पालन करने पर पुलिस बिना कोर्ट आदेश के गिरफ्तार नहीं कर सकती।
- कहें: 'सर, कृपया धारा 41A के तहत लिखित नोटिस भेजें, मैं अपने वकील के साथ उपस्थित हो जाऊंगा।'
क्या एफआईआर दर्ज कराने पर तुरंत मुफ्त कॉपी पाना आपका कानूनी अधिकार है?
हाँ। धारा 154(2) के तहत शिकायतकर्ता को एफआईआर की मुहर लगी प्रति तुरंत और बिल्कुल मुफ्त देना पुलिस का कानूनी कर्तव्य है।
- • पुलिस एफआईआर की कॉपी के लिए पैसे नहीं मांग सकती।
- • सुप्रीम कोर्ट के आदेश से एफआईआर 24-48 घंटे में ऑनलाइन पोर्टल पर भी उपलब्ध होनी चाहिए।
- कहें: 'सर, धारा 154(2) के तहत कृपया मुझे एफआईआर की प्रमाणित मुफ्त कॉपी दीजिए।'
क्या पुलिस 15 वर्ष से कम उम्र के बच्चों, महिलाओं या 65 वर्ष से अधिक के बुजुर्गों को थाने बुला सकती है?
सख्ती से मना है। धारा 160 के तहत महिलाओं, 15 साल से कम उम्र के बच्चों और 65 साल से बड़े बुजुर्गों से केवल उनके घर जाकर ही पूछताछ की जा सकती है।
- • पुलिस अधिकारी को परिजनों की मौजूदगी में उनके घर आकर बयान लेना होगा।
- • थाने बुलाना कानून का सीधा उल्लंघन है।
- कहें: 'धारा 160 के अनुसार आप मुझे थाने नहीं बुला सकते। आप घर आकर बयान दर्ज कर सकते हैं।'
क्या पुलिस के सामने कबूल किया गया अपराध कोर्ट में सबूत माना जाता है?
बिल्कुल नहीं। पुलिस के सामने दिए गए किसी भी कबूलनामे या साइन किए गए कागज की कोर्ट में कोई कानूनी मान्यता नहीं होती।
- • केवल मजिस्ट्रेट के सामने अपनी मर्जी से दिया गया बयान (धारा 164) ही कोर्ट में मान्य होता है।
- • थाने में मारपीट कर साइन कराए गए कागजात कोर्ट में अमान्य होते हैं।
- मजिस्ट्रेट के सामने पेश होते ही तुरंत बताएं कि पुलिस ने डरा-धमकाकर जबरन साइन करवाए हैं।
यदि थाना प्रभारी गंभीर अपराध पर भी एफआईआर दर्ज करने से मना कर दे तो क्या करें?
संगीन अपराध है। एफआईआर न लिखने वाले पुलिस अधिकारी को धारा 166A (BNS 199) के तहत 2 साल तक की जेल हो सकती है।
- • ललिता कुमारी केस में सुप्रीम कोर्ट ने एफआईआर दर्ज करना अनिवार्य किया है।
- • थाना न सुने तो एसपी (SP) को रजिस्टर्ड डाक से शिकायत भेजें या कोर्ट में धारा 156(3) में अर्जी लगाएं।
- अपनी लिखित शिकायत की रिसीविंग लें और न मिलने पर एसपी को रजिस्टर्ड डाक से भेजें।