उद्देशिका (संविधान की प्रस्तावना)
प्रस्तावना संविधान का परिचय पत्र है। यह घोषित करती है कि देश की सर्वोच्च शक्ति "हम, भारत के लोग" के हाथों में है। कोई भी सरकार ऐसा कानून नहीं बना सकती जो न्याय, बराबरी और मानवीय गरिमा के खिलाफ हो।
प्रस्तावना संविधान का परिचय पत्र है। यह घोषित करती है कि देश की सर्वोच्च शक्ति "हम, भारत के लोग" के हाथों में है। कोई भी सरकार ऐसा कानून नहीं बना सकती जो न्याय, बराबरी और मानवीय गरिमा के खिलाफ हो।
अनुच्छेद 1 स्पष्ट करता है कि "भारत, अर्थात इंडिया, राज्यों का संघ होगा।" यह देश की क्षेत्रीय सीमाओं और सभी राज्यों व केंद्र शासित प्रदेशों को एक अटूट सूत्र में बांधता है।
संविधान के Part I (संघ और उसका राज्यक्षेत्र) में स्थित अनुच्छेद 2 'नए राज्यों का प्रवेश या स्थापना' का प्रावधान करता है। यह अनुच्छेद संसद को राज्यों के प्रवेश, पुनर्गठन और पहली तथा चौथी अनुसूची में आवश्यक संशोधनों की वैधानिक प्रक्रिया तय करने का अधिकार देता है।
संविधान के Part I (संघ और उसका राज्यक्षेत्र) में स्थित अनुच्छेद 3 'नए राज्यों का निर्माण और वर्तमान राज्यों के क्षेत्रों, सीमाओं या नामों में परिवर्तन' का प्रावधान करता है। यह अनुच्छेद संसद को राज्यों के प्रवेश, पुनर्गठन और पहली तथा चौथी अनुसूची में आवश्यक संशोधनों की वैधानिक प्रक्रिया तय करने का अधिकार देता है।
संविधान के Part I (संघ और उसका राज्यक्षेत्र) में स्थित अनुच्छेद 4 'पहली और चौथी अनुसूचियों के संशोधन तथा अनुपूरक विषयों का उपबंध करने के लिए अनुच्छेद 2 और 3 के अधीन बनाई गई विधियां' का प्रावधान करता है। यह अनुच्छेद संसद को राज्यों के प्रवेश, पुनर्गठन और पहली तथा चौथी अनुसूची में आवश्यक संशोधनों की वैधानिक प्रक्रिया तय करने का अधिकार देता है।
संविधान के भाग II (नागरिकता) का अनुच्छेद 5 'संविधान के प्रारंभ पर नागरिकता' को स्पष्ट करता है। यह 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय अधिवास (Domicile), विभाजन के दौरान प्रव्रजन (Migration), विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों या विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता की स्थिति तय करता है।
संविधान के भाग II (नागरिकता) का अनुच्छेद 6 'पाकिस्तान से भारत को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार' को स्पष्ट करता है। यह 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय अधिवास (Domicile), विभाजन के दौरान प्रव्रजन (Migration), विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों या विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता की स्थिति तय करता है।
संविधान के भाग II (नागरिकता) का अनुच्छेद 7 'पाकिस्तान को प्रव्रजन करने वाले कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार' को स्पष्ट करता है। यह 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय अधिवास (Domicile), विभाजन के दौरान प्रव्रजन (Migration), विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों या विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता की स्थिति तय करता है।
संविधान के भाग II (नागरिकता) का अनुच्छेद 8 'भारत के बाहर रहने वाले भारतीय उद्भव के कुछ व्यक्तियों के नागरिकता के अधिकार' को स्पष्ट करता है। यह 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय अधिवास (Domicile), विभाजन के दौरान प्रव्रजन (Migration), विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों या विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता की स्थिति तय करता है।
संविधान के भाग II (नागरिकता) का अनुच्छेद 9 'विदेशी राज्य की नागरिकता स्वेच्छा से अर्जित करने वाले व्यक्तियों का नागरिक न होना' को स्पष्ट करता है। यह 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय अधिवास (Domicile), विभाजन के दौरान प्रव्रजन (Migration), विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों या विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता की स्थिति तय करता है।
अनुच्छेद 10 भारतीय नागरिकों को स्थायी संवैधानिक सुरक्षा प्रदान करता है। यह स्पष्ट करता है कि भारत का नागरिक निरंतर नागरिक बना रहेगा। कोई भी पुलिस अफसर या सरकारी अधिकारी किसी नागरिक को मनमाने ढंग से "गैर-नागरिक" घोषित नहीं कर सकता या उसके अधिकार नहीं छीन सकता।
संविधान के भाग II (नागरिकता) का अनुच्छेद 11 'संसद द्वारा नागरिकता के अधिकार का विधि द्वारा विनियमन किया जाना' को स्पष्ट करता है। यह 26 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के समय अधिवास (Domicile), विभाजन के दौरान प्रव्रजन (Migration), विदेश में रहने वाले भारतीय मूल के व्यक्तियों या विदेशी नागरिकता लेने पर भारतीय नागरिकता की स्थिति तय करता है।
मौलिक अधिकार हमें सरकार के मनमानेपन से बचाते हैं। अनुच्छेद 12 बताता है कि "राज्य" में कौन-कौन शामिल हैं: केंद्र सरकार, संसद, राज्य सरकारें, पुलिस, नगर पालिकाएं, पंचायतें और सरकारी उपक्रम।
अनुच्छेद 13 न्यायपालिका को न्यायिक समीक्षा (Judicial Review) की शक्ति देता है। संसद या सरकार ऐसा कोई कानून या नियम नहीं बना सकती जो आपके मूल अधिकारों को छीने। यदि ऐसा हुआ तो कोर्ट उसे तुरंत रद्द कर देगी।
अनुच्छेद 14 भारत में 'कानून के शासन' (Rule of Law) की आधारशिला है और संविधान के 'स्वर्णिम त्रिभुज' (अनुच्छेद 14, 19 और 21) का पहला स्तंभ है। यह दो महान सिद्धांतों को जोड़ता है: (1) 'विधि के समक्ष समता'—जिसका अर्थ है कि कोई भी व्यक्ति (चाहे वह कितना भी अमीर या प्रभावशाली हो) कानून से ऊपर नहीं है; और (2) 'विधियों का समान संरक्षण'—जिसका अर्थ है कि समान परिस्थितियों में रहने वाले लोगों के साथ कानून समान व्यवहार करेगा। सुप्रीम कोर्ट ने 'ई.पी. रोयप्पा (1974)' मामले में ऐतिहासिक सिद्धांत दिया कि 'समानता और मनमानापन एक-दूसरे के कट्टर दुश्मन हैं।' यदि कोई पुलिस अधिकारी, सरकारी विभाग या नगर निगम बिना किसी ठोस व तार्किक कारण के पक्षपातपूर्ण या मनमाना आदेश पारित करता है, तो वह सीधे अनुच्छेद 14 का उल्लंघन है और अदालत उसे तुरंत रद्द कर सकती है।
अनुच्छेद 15 समाज में व्याप्त भेदभाव को जड़ से मिटाने का संवैधानिक कवच है। अनुच्छेद 15(1) राज्य को धर्म, मूलवंश, जाति, लिंग या जन्मस्थान के आधार पर किसी भी नागरिक से भेदभाव करने से रोकता है। सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि अनुच्छेद 15(2) निजी मालिकों पर भी लागू होता है: कोई भी दुकानदार, होटल, रेस्तरां, मॉल या सिनेमा हॉल का मालिक आपको आपकी जाति, धर्म या लिंग के आधार पर प्रवेश देने से मना नहीं कर सकता, और न ही सार्वजनिक कुओं, तालाबों, घाटों या सड़कों के उपयोग से रोक सकता है। इसके साथ ही, अनुच्छेद 15(3) से 15(6) 'सकारात्मक समानता' सुनिश्चित करते हैं। ये सरकार को महिलाओं और बच्चों के लिए विशेष कानून व योजनाएं बनाने तथा सामाजिक-शैक्षणिक रूप से पिछड़े वर्गों (OBC), अनुसूचित जाति (SC), अनुसूचित जनजाति (ST) और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए शिक्षण संस्थानों में आरक्षण देने की शक्ति प्रदान करते हैं।
अनुच्छेद 16 सरकारी नौकरियों में बराबरी और निष्पक्षता की आधारशिला है। यह मनमाने भेदभाव पर रोक लगाते हुए राज्य को पिछड़े वर्गों, अनुसूचित जातियों, जनजातियों और आर्थिक रूप से कमजोर वर्गों (EWS) के लिए आरक्षण व विशेष प्रावधान बनाने की शक्ति देता है।
अनुच्छेद 17 एक पूर्ण मौलिक अधिकार है। यह छुआछूत की कुप्रथा को जड़ से समाप्त करता है। किसी भी व्यक्ति को सार्वजनिक स्थान, मंदिर, कुएं, भोजनालय या अस्पताल में जाति के आधार पर प्रवेश से रोकना गंभीर संज्ञेय अपराध है।
अंग्रेजी शासन में 'राय बहादुर', 'खान बहादुर' और 'सर' जैसी उपाधियां देकर समाज में कृत्रिम ऊंच-नीच पैदा की जाती थी। अनुच्छेद 18 इस सामंती व्यवस्था को समाप्त करता है। अनुच्छेद 18(1) के अनुसार राज्य सेना या विद्या (जैसे परमवीर चक्र, पीएचडी, डॉक्टर) संबंधी सम्मान के सिवाय कोई और उपाधि नहीं देगा। 'बालाजी राघवन बनाम भारत संघ (1996)' में सुप्रीम कोर्ट ने स्पष्ट किया कि भारत रत्न और पद्म पुरस्कार अनुच्छेद 18 के तहत 'उपाधि' नहीं हैं, बल्कि उत्कृष्ट योगदान का सम्मान हैं—बशर्ते पुरस्कार विजेता इनका प्रयोग अपने नाम के आगे या पीछे (Prefix/Suffix) उपाधि की तरह न करें।
अनुच्छेद 19 भारतीय लोकतंत्र की प्राणवायु है। यह अनुच्छेद 19(1) के तहत प्रत्येक भारतीय नागरिक को 6 बुनियादी स्वतंत्रताएं प्रदान करता है: • अनुच्छेद 19(1)(a) — वाक् और अभिव्यक्ति की स्वतंत्रता: इसमें बोलने, लिखने, प्रेस की आजादी, सरकारी नीतियों की आलोचना करने, सूचना का अधिकार (RTI), इंटरनेट के माध्यम से विचार रखने और अपने घर पर राष्ट्रीय ध्वज फहराने का अधिकार शामिल है। • अनुच्छेद 19(1)(b) — शांतिपूर्वक और निरायुध (बिना हथियार) सम्मेलन का अधिकार: शांतिपूर्ण धरना, जुलूस और जनसभा करने का अधिकार। • अनुच्छेद 19(1)(c) — संगम, संघ या सहकारी समिति बनाने का अधिकार: राजनीतिक दल, मजदूर यूनियन, एनजीओ या सोसाइटी बनाने की आजादी। • अनुच्छेद 19(1)(d) — भारत के राज्यक्षेत्र में सर्वत्र अबाध संचरण का अधिकार: देश के किसी भी राज्य या शहर में बिना रोक-टोक आने-जाने की स्वतंत्रता। • अनुच्छेद 19(1)(e) — भारत के किसी भी भाग में निवास करने और बस जाने का अधिकार: किसी भी राज्य में किराये पर रहने या बसने का हक। • अनुच्छेद 19(1)(g) — कोई भी वृत्ति, उपजीविका, व्यापार या कारोबार करने का अधिकार: रेहड़ी-पटरी वाले से लेकर स्टार्टअप और पेशेवरों तक को अपनी आजीविका कमाने की आजादी।
अनुच्छेद 20 पुलिस की मनमानी और दमनकारी आपराधिक कानूनों के विरुद्ध नागरिकों का अभेद्य कवच है। अनुच्छेद 21 के साथ यह इतना पवित्र है कि 44वें संविधान संशोधन के तहत राष्ट्रीय आपातकाल में भी इसे कभी निलंबित नहीं किया जा सकता। इसके तीन अटल स्तंभ हैं: 1. अनुच्छेद 20(1) — भूतलक्षी दांडिक विधियों से संरक्षण (Ex-Post Facto Law): यदि कोई कार्य करते समय वह कानूनन अपराध नहीं था, तो बाद में नया कानून बनाकर आपको उस पुराने कार्य के लिए सजा नहीं दी जा सकती, और न ही उस समय तय सजा से अधिक सजा दी जा सकती है। 2. अनुच्छेद 20(2) — दोहरे दंड से सुरक्षा (Double Jeopardy): किसी भी व्यक्ति पर एक ही अपराध के लिए अदालत में एक से अधिक बार मुकदमा चलाकर दंडित नहीं किया जा सकता। 3. अनुच्छेद 20(3) — आत्म-अभिशंसन से संरक्षण (Right against Self-Incrimination): किसी भी अभियुक्त को खुद के खिलाफ गवाह बनने के लिए मजबूर नहीं किया जा सकता। इसीलिए थाने में पुलिस के डर या मारपीट से लिया गया बयान या सादे कागज पर हस्ताक्षर कोर्ट में शून्य (अमान्य) होता है।
अनुच्छेद 21 केवल एक वाक्य का है—'किसी भी व्यक्ति को उसके प्राण या दैहिक स्वतंत्रता से विधि द्वारा स्थापित प्रक्रिया के अनुसार ही वंचित किया जाएगा, अन्यथा नहीं'—लेकिन यह भारतीय संविधान का सबसे विशाल व जीवंत मानवाधिकार स्तंभ है। यह 'व्यक्ति' शब्द का प्रयोग करता है, इसलिए यह भारतीय नागरिकों और विदेशियों दोनों की रक्षा करता है। 1978 के ऐतिहासिक 'मेनका गांधी बनाम भारत संघ' फैसले में सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 14, 19 और 21 को जोड़कर 'स्वर्णिम त्रिभुज' (Golden Triangle) की स्थापना की। कोर्ट ने घोषित किया कि 'जीवन' का अर्थ केवल सांस लेना या पशुवत जीवित रहना नहीं है, बल्कि 'मानवीय गरिमा के साथ जीने का अधिकार' है। साथ ही, जिस कानून से स्वतंत्रता सीमित की जाए, वह कानून स्वयं 'न्यायसंगत, निष्पक्ष और तार्किक' (Just, Fair and Reasonable) होना चाहिए। सुप्रीम कोर्ट ने अनुच्छेद 21 के भीतर 35 से अधिक मौलिक अधिकारों को समाहित किया है—जिनमें निजता का अधिकार (पुट्टास्वामी, 2017), सड़क दुर्घटना या आपातकाल में तुरंत इलाज का अधिकार (परमानंद कटारा, 1989), आजीविका और आश्रय का अधिकार (ओल्गा टेलिस, 1985), स्वच्छ हवा व पानी का अधिकार, त्वरित सुनवाई व मुफ्त कानूनी सहायता (हुसैनआरा खातून, 1979), अवैध हथकड़ी व हिरासत में प्रताड़ना से मुक्ति, और गरिमापूर्ण मृत्यु/लिविंग विल का अधिकार शामिल हैं।
प्रारंभ में शिक्षा का उल्लेख नीति निर्देशक तत्व (अनुच्छेद 45) में था, किंतु 'उन्नी कृष्णन (1993)' फैसले के बाद संसद ने 86वां संविधान संशोधन अधिनियम, 2002 पारित कर अनुच्छेद 21A को मौलिक अधिकार बना दिया। इसे धरातल पर लागू करने के लिए 'शिक्षा का अधिकार अधिनियम (RTE Act), 2009' लागू किया गया। इसमें 'निःशुल्क' का अर्थ है कि 6 से 14 वर्ष के किसी भी बच्चे से सरकारी स्कूल में ट्यूशन फीस, किताबों, यूनिफॉर्म या मध्याह्न भोजन (Mid-Day Meal) के लिए कोई पैसा नहीं लिया जाएगा। 'अनिवार्य' शब्द सरकार पर यह कानूनी जिम्मेदारी डालता है कि हर बस्ती के 1 से 3 किलोमीटर के भीतर स्कूल हो, प्रशिक्षित शिक्षक हों, और सभी गैर-सहायता प्राप्त निजी (प्राइवेट) स्कूलों की शुरुआती कक्षा में 25% सीटें गरीब और वंचित वर्ग (EWS/DG) के बच्चों के लिए पूरी तरह मुफ्त आरक्षित हों।
अनुच्छेद 22 पुलिस थाने के भीतर आम नागरिक का सबसे बड़ा रक्षक है। यह सुनिश्चित करता है कि पुलिस किसी भी व्यक्ति को 'पूछताछ' के बहाने गुप्त रूप से उठाकर अवैध रूप से हवालात में बंद न रख सके। अनुच्छेद 22(1) और 22(2) प्रत्येक सामान्य गिरफ्तारी के लिए तीन अटल नियम तय करते हैं: 1. गिरफ्तारी का कारण जानने का अधिकार (अनुच्छेद 22(1)): गिरफ्तार करते समय पुलिस के लिए यह बताना अनिवार्य है कि आपको किस अपराध और किस आधार पर गिरफ्तार किया जा रहा है (सुप्रीम कोर्ट के पंकज बंसल 2023 व प्रबीर पुरकायस्थ 2024 फैसलों के अनुसार लिखित में आधार देना अनिवार्य है)। 2. अपनी पसंद के वकील से परामर्श और बचाव का अधिकार (अनुच्छेद 22(1)): हिरासत में लिए जाने के पहले क्षण से ही आपको अपने वकील से बात करने का संवैधानिक हक है। 3. 24 घंटे का मजिस्ट्रेट नियम (अनुच्छेद 22(2)): गिरफ्तार व्यक्ति को यात्रा के समय को छोड़कर 24 घंटे के भीतर नजदीकी न्यायिक मजिस्ट्रेट के सामने पेश करना अनिवार्य है। मजिस्ट्रेट के आदेश के बिना 24 घंटे से एक मिनट भी अधिक थाने में रखना अवैध हिरासत (Illegal Detention) है। इसके अलावा, अनुच्छेद 22(4)–22(7) निवारक निरोध (Preventive Detention) पर भी सख्त अंकुश लगाते हैं: हाईकोर्ट के जजों के सलाहकार बोर्ड की मंजूरी के बिना किसी को 3 महीने से अधिक निरुद्ध नहीं रखा जा सकता।
अनुच्छेद 23 बंधुआ मजदूरी, मानव तस्करी और श्रमिकों के शोषण से सुरक्षा प्रदान करता है। किसी को उसकी मर्जी के बिना काम करने पर मजबूर करना या न्यूनतम मजदूरी से कम भुगतान करना इस अनुच्छेद के तहत अवैध 'बलात श्रम' माना जाता है।
अनुच्छेद 24 बाल अधिकारों की ढाल है। यह 14 साल से छोटे बच्चों को जोखिम भरे कामों, फैक्ट्रियों या खदानों में काम करने से रोकता है। अनुच्छेद 21A के साथ मिलकर यह सुनिश्चित करता है कि हर बच्चे का स्थान स्कूल में है, काम पर नहीं।
अनुच्छेद 25 भारतीय पंथनिरपेक्षता (धर्मनिरपेक्षता) की आत्मा है। यह हर व्यक्ति को अपनी अंतरात्मा की आवाज सुनने और अपनी पसंद के धर्म का पालन करने की स्वतंत्रता देता है। भारतीय राज्य किसी एक धर्म का पक्ष नहीं लेता बल्कि सभी धर्मों का समान सम्मान करता है।
जहां अनुच्छेद 25 व्यक्तिगत धार्मिक स्वतंत्रता की रक्षा करता है, वहीं अनुच्छेद 26 धार्मिक संप्रदायों के सामूहिक अधिकारों की रक्षा करता है। लोक व्यवस्था, सदाचार और स्वास्थ्य के अधीन रहते हुए प्रत्येक धार्मिक संप्रदाय को मंदिर, मस्जिद, गुरुद्वारा, चर्च या धर्मार्थ ट्रस्ट स्थापित करने, अपने धार्मिक अनुष्ठानों का प्रबंधन करने और कानून के अनुसार संपत्ति का प्रशासन करने का अधिकार है।
अनुच्छेद 27 भारतीय पंथनिरपेक्षता का वित्तीय स्तंभ है। यह सुनिश्चित करता है कि सभी धर्मों के नागरिकों से वसूले गए सरकारी टैक्स के पैसे को किसी एक विशेष धर्म के प्रचार या रखरखाव के लिए समर्पित नहीं किया जा सकता। हालांकि, तीर्थयात्रियों की सुरक्षा, स्वच्छता और प्रबंधन के लिए लिया जाने वाला मामूली 'सेवा शुल्क' (Fee) टैक्स नहीं माना जाता।
अनुच्छेद 28 शिक्षा परिसरों को धर्मनिरपेक्ष और समावेशी बनाए रखता है। अनुच्छेद 28(1) के अनुसार, पूर्णतः राज्य निधि से संचालित किसी भी सरकारी स्कूल/कॉलेज में कोई धार्मिक शिक्षा नहीं दी जाएगी। अनुच्छेद 28(3) के अनुसार, राज्य से मान्यता प्राप्त या सहायता प्राप्त किसी भी स्कूल में किसी छात्र को उसकी (या नाबालिग होने पर उसके माता-पिता की) सहमति के बिना किसी धार्मिक उपासना या धार्मिक कक्षा में बैठने के लिए बाध्य नहीं किया जा सकता।
भारतीय प्रतिलिप्यधिकार अधिनियम (Copyright Act), 1957 की धारा 52(1)(q) के अंतर्गत भारत का संविधान, संसदीय अधिनियम, राजपत्र अधिसूचनाएं तथा उच्चतम न्यायालय एवं उच्च न्यायालयों के निर्णय सार्वजनिक डोमेन (Public Domain) में हैं। यह पाठ विधायी विभाग, विधि और न्याय मंत्रालय, भारत सरकार (India Code) के आधिकारिक अभिलेखों पर आधारित है।